वर्ष 1947 में अपनी स्थापना तथा 1961 में गठन के बाद भाकृअनुप-केंद्रीय अन्तर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सिफरी) देश की अन्तर्स्थलीय खुलाजल मत्स्य क्षेत्र का राष्ट्रीय चिंतन केंद्र और वैज्ञानिक तौर पर आधार स्तंभ के रूप में देखा गया है। अब तक संस्थान ने साक्ष्य-आधारित प्रौद्योगिकियाँ, नीतिगत सुझाव और प्रबंधन रूपरेखाएँ विकसित की हैं, जिन्होंने देश में सतत मत्स्य संचालन और प्रबंधन को बहु आयामी दिशा प्रदान की है।
भारत के अन्तर्स्थलीय खुलाजल संसाधन जैसे नदियाँ, जलाशय, बाढ़कृत आर्द्रभूमि, मुहाना, लैगून तथा बैकवाटर—एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संपदा के तौर पर कार्य करते आए हैं। ये परितंत्र न केवल खाद्य एवं पोषण सुरक्षा में योगदान देते हैं, बल्कि लगभग 12.4 लाख अन्तर्स्थलीय मत्स्यजीवियों की आजीविका के मजबूत आधार भी हैं, जिनमें से अनेक सामाजिक एवं आर्थिक तौर पर निर्धन समुदाय से आते हैं। हालांकि मछलियों के अति-दोहन, जल-प्रवाह में परिवर्तन, आवासीय क्षरण, प्रदूषण तथा जलवायु परिवर्तनशीलता इनके सतत् अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहे हैं। इन चुनौतियों का समाधान विज्ञान-आधारित, नीति-संगत और संस्थागत तौर पर समन्वित दृष्टिकोण से ही संभव है।
इसी संदर्भ में, सिफरी नवाचार, जलवायु अनुकूलनशीलता तथा व्यावसायीकरण के एकीकरण के माध्यम से सतत मत्स्य विकास को सुदृढ़ करने, ग्रामीण आजीविका को सशक्त बनाने तथा भारत की ब्लू इकोनॉमी को गति देने के प्रति प्रतिबद्ध है। हमारा दृष्टिकोण राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं तथा ‘विकसित भारत @2047’ की परिकल्पना के अनुरूप है, जिसमें पारिस्थितिक स्थिरता, आर्थिक विकास और सामाजिक समावेशन को एकीकृत रूप में आगे बढ़ाने पर केंद्रित है।
संस्थान के अनुसंधान एवं नीतिगत प्राथमिकता क्षेत्र में जलाशयों और आर्द्रभूमि में मत्स्य संवर्धन एवं वैज्ञानिक भंडार प्रबंधन; नदीय एवं मुहाना पारितंत्र संरक्षण; पर्यावरणीय प्रवाह आकलन; मत्स्य आवास फिंगरप्रिंटिंग; जीआईएस एवं रिमोट सेंसिंग आधारित संसाधन मानचित्रण; परितंत्र स्वास्थ्य मानदंड; प्रदूषण शमन; मत्स्य रोग निगरानी; जैव विविधता संरक्षण तथा जलवायु-सहिष्णु मत्स्य मॉडलिंग शामिल हैं। साथ ही, डीसीजन सपोर्ट प्रणालियों, संसाधन आकलन एवं पूर्वानुमान मॉडल, पारितंत्र सेवाओं के आर्थिक मूल्यांकन तथा सहभागितापूर्ण संचालन के विकास पर भी समान बल दिया जाता है, जिससे साक्ष्य-आधारित नीतिनिर्माण को सुदृढ़ किया जा सके।
सिफरी जीनोमिक्स, मेटाजीनोमिक्स, प्रोटिओमिक्स तथा नैनोप्रौद्योगिकी जैसे उभरते क्षेत्रों में अग्रणी अनुसंधान की दिशा में प्रयासरत है, ताकि सतत जलीय पारितंत्र प्रबंधन हेतु भावी समाधान उपाय उपलब्ध कराए जा सकें। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (नमामि गंगे) के वैज्ञानिक सहयोगी के रूप में संस्थान का गंगा नदीय तंत्र के आकलन, संरक्षण योजना एवं पुनर्स्थापन रणनीतियों में अभिन्न योगदान है, जिससे नदी बेसिन प्रबंधन नीतियों में मत्स्य विज्ञान का समुचित एकीकरण सुनिश्चित हो सके।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ‘फार्मर्स फर्स्ट’ एवं ‘मेरा गाँव मेरा गौरव’ पहल के अंतर्गत, तथा सुंदरबन जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में जनजातीय उपयोजना के लक्षित प्रयासों के माध्यम से संस्थान ने अनुसंधान का क्षेत्रीय स्तर पर प्रभाव, क्षमता निर्माण और आजीविका संवर्धन को सुनिश्चित करता है। राष्ट्रीय संस्थानों, राज्य मत्स्य विभागों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोगात्मक सहभागिता नीति समन्वय और प्रौद्योगिकी प्रसार को और सुदृढ़ करती है।
‘विकसित भारत @2047’ की दिशा में अग्रसर होने के साथ, हमारा दायित्व केवल अनुसंधान उत्कृष्टता तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्तर्स्थलीय मत्स्य पालन और प्रबंधन में रणनीतिक नेतृत्व प्रदान करना भी है। समन्वित वैज्ञानिक प्रयासों, अंतर-संस्थागत साझेदारी और परिणामोन्मुखी नीतिगत रूपरेखाओं को प्रोत्साहित करते हुए, सिफरी भारत को सतत अन्तर्स्थलीय मत्स्य और ब्लू इकोनॉमी विकास में वैश्विक तौर पर पर एक अग्रणी संस्था के रूप में स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है। विज्ञान-आधारित नेतृत्व और समावेशी विकास के माध्यम से, हम एक सुदृढ़ जलीय पारितंत्र और समृद्ध मत्स्य समुदाय सुनिश्चित करने हेतु संकल्पित हैं।